Kritik ist überall, zumal in Deutschland nötig : Satiren und Schriften zur Literatur
मुख्य लेखक: | |
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अन्य लेखक: | |
स्वरूप: | पुस्तक |
भाषा: | German |
प्रकाशित: |
Leipzig ; Weimar :
Kiepenheuer,
1987
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संस्करण: | 1. Auflage |
श्रृंखला: | Bibliothek des 18. Jahrhunderts
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विषय: | |
अंतर्वस्तु / टुकड़े: | 2 अभिलेख |
भौतिक वर्णन: | 581 S : mit 1 Frontispiz u. 20 zeitgenössischen Abb. |
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आईएसबीएन: | 3-378-00118-6 |
बोधानक: | H 012 |